एक कहानी, बस यूं ही (भाग तीन)

(Continued from here)

स्थान – जयपुर, उस लड़की का घर, रात का वक्त।

चियर्स चियर्स… मस्त पार्टी है यार। कब से इंतज़ार था इस पार्टी का। 5 साल हो गए यार तुझे इस शहर में आए, इस ऑफिस में काम करते। कंजूस कहीं की, अब दी है पार्टी, पता नहीं कहां खोई रहती है तू। पार्टी हमें दी है पर ऐसा लगता है कि तेरा मन किसी और का इंतज़ार कर रहा है, हर वक्त।

चल बहुत रात हो गई अब हम सब चलते हैं।

सब चले गए, उफ्फ् हिम्मत नहीं ये कचरा समेटने की। शरीर थक कर चूर हो चुका है। पता नहीं कब जिस्म खिंच कर बिस्तर पर चला गया। पर नींद क्यों नहीं आ रही। सुना है थकान, नींद की सबसे अच्छी दोस्त होती है। पर मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं हो रहा। क्या मेरी किस्मत में दोस्त नहीं या दोस्ती नहीं। अनमना मन फिर जा पहुंचा पुराने दिनों में।

फ्लेशबैक में जीवन को देखना कितना अच्छा लगता है न, किसी पुरानी फ़िल्म की तरह। सच ही तो कहता था वो कि मैं बहुत फ़िल्मी हूँ। अरे नहीं, फिर नहीं। न चाहते हुए भी क्यों, क्यों हर बार मेरी हर बात उस पर आकर टिक जाती है। 5 साल हो गए। हमें दूर हुए, या ये कहें, कि करीब आए।

कभी हम तो कभी हालात ऐसे बने कि मिलना हुआ ही नहीं। हालात को क्या दोष दें कहीं न कहीं हम ही कतराने लगे थे एक-दूसरे से मिलने में। मैं सोचती कि अब मिलूंगी भी तो क्या बात करुँगी, क्या कहूँगी तुमसे। क्या हमारे बीच ऐसा कोई मुद्दा है जिस पर हम बात कर सकते हैं, गप्पे मार सकते हैं।

कई बार सोचा कि तुम्हारे साथ फ़िल्म देखने चलूँ, शायद यही ऐसा शौक है जो हम दोनों में है। शायद नहीं पक्का। फिल्मी बोलकर बदनाम मुझे करते थे तुम, पर तुम भी कम फिल्मी नहीं रहे, ये जानती हूं मैं। फिर क्यों जब भी मैं तुम्हें फिल्म देखने चलने के लिए कहती तुम उसे फ्लॉप या खामियां निकालकर चलने से मना कर देते।

कॉफ़ी पर मिलते हैं, ये कहा था मैंने, पर तुम्हें कॉफ़ी पसंद नहीं। जब भी छुट्टियों में अपने शहर आती, सारा वक़्त या तो कश्मकश में बीत जाता या नाराज़गी में। फिर परिवार को वक़्त न दूँ तो ये भी तो ठीक नहीं।

खैर शायद ये बहाने हैं, कभी कभी नहीं लगता कि अगर दुनिया में बहाने नहीं होते तो हमारी लाइफ कितनी बोरिंग हो जाती। मन को भी कितना बहाना बनाकर संभाला है मैंने। कई बार, न जाने कितनी बार, बहाने कुछ भी बना लें लेकिन इतना तो हम दोनों एक-दूसरे को जानते हैं कि अगर हम चाहते तो मिलते ज़रूर। हैं ना?

रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं न। कभी इतना गुस्सा आता है कि लगता है तुमसे सबकुछ ख़त्म कर लूँ। कभी मन की हालत ऐसी होती है कि तुम्हारे बिना जीना मुश्किल लगता है। कभी मन करता है तुमसे खूब झगड़ा करूँ फिर लगता है जिस चीज़ पर जोर नहीं उसे छोड़ देना ही अच्छा है शायद। दिल और दिमाग के द्वंद को कब नींद ने शांत किया पता ही नहीं चला।

बालकनी से झांकती सूरज की किरणों ने जब गुड मॉर्निंग कहा तब आंख खुली। कल की पार्टी का हैंगओवर अब तक उतरा नहीं, क्यों न कॉफी पी जाए।

हुमममम… कॉफी का कोई जवाब नहीं, हर घूंट के साथ एक सुकून सा लगता है, खासकर अपने हाथ की, खुद की तारीफ करते करते मन में एक सवाल फिर उठा, क्या सच में कल जो दिलो-दिमाग की लड़ाई थी वो सही थी, क्या दिमाग कुछ कह रहा था या दिल कुछ ठान रहा था। क्या सच्चाई को स्वीकार कर चुकी थी मैं कि अब इस रिश्ते से कोई उम्मीद नहीं। क्या मैं किसी तरह के बंधन से आज़ादी महसूस कर रही थी, बंधन अपने मन का, अपने आप से। जो रह-रह कर मुझे कहीं खींच ले जा रहा था। लेकिन कल रात क बाद से क्यों एक हल्कापन महसूस हो रहा था। क्या सोच रहा था मेरा दिमाग, क्या महसूस कर रहा था मेरा मन, कुछ समझ नहीं आ रहा, पर जो भी हो, बड़े दिनों बाद एक अजीब सी शांति महसूस की है मैंने, तो क्यों ना इसे सेलिब्रेट किया जाए। फिर बारिश के मौसम में गरमागरम कॉफी से अच्छा क्या होगा, वो भी अपनी कंपनी के साथ। मैं और मेरी तन्हाईंया। हां, हां मुझे पता है मैं बहुत फिल्मी हूं।

मैं झटपट तैयार हुई और कॉफी शॉप पहुँच गई। ये शॉप मुझे इसलिए भी पसंद है क्योंकि मैं जब भी यहाँ आती हूँ। यहाँ गुलज़ार के गाने बैकग्राउंड में राहत की बूंदे बिखेरते हैं। एक ही बार तो पूछा था उस शख्स ने कि मुझे किस तरह के गाने पसंद हैं। उसके बाद से जब भी यहाँ आती हूँ। गुलज़ार के नगमें सारी कॉफी शॉप को महकाते रहते हैं। कौन है वो। क्या ये कॉफी शॉप उसकी है। पता नहीं। पर हाँ कॉफी बहुत अच्छी बनती है यहाँ, बिल्कुल मेरे टाइप की।

(जारी है…)