एक कहानी, बस यूं ही (भाग चार)

(Continued from here)

स्थान – उस लड़के का घर

माँ की आवाज़ के साथ नींद खुली। आवाज़ नहीं फटकार। फटकार कि मैं फिर रात भर म्यूजिक सिस्टम ऑन करके सो गया। माँ बुदबुदा रही थी। बिजली का बिल इतना इतना आता है नवाब को चिंता नहीं। 5 साल हो गए टोकते टोकते। पहले तो कुछ किया नहीं गया अब ग़ालिब बने फिरता है। समझ नहीं आया माँ ताना मार रही है या सहानुभूति जाता रही है।

खैर माँ की बात को अनसुना करते हुए मैंने चाय का प्याला उठाया। वो ठंडी हो चुकी थी। लेकिन माँ का चेहरा देखकर हिम्मत नहीं हुई कि कहूँ फिर से बना दो। मैं पी गया। माँ को न जाने क्या लगा अचानक ही बोली ब्लैक कॉफी पियोगे, क्योंकि दूध नहीं है जो फिर से चाय बना दूँ। मैंने सर हिला दिया। माँ की बात पर थोड़ा गुस्सा तो थोड़ा प्यार भी आया। अरे ब्लैक कॉफी ही नहीं ब्लैक चाय भी तो होती है। पर माँ शायद मुझे कुछ याद दिलाने की कोशिश कर रही थी।

ब्लैक कॉफी तुम्हें बहुत पसंद है न? कितनी बार तुमने मुझे कहा कि कॉफी पर मिलते हैं पर मुझे तुमसे कॉ़फी पर मिलना अच्छा नहीं लगता। सच कहूँ कॉफी का स्वाद, स्वाद होता है पर तुम जब उसके फ्लेवर के बारे में बात करती तो ऐसा लगता जैसी अमृत पी रही हो।

बाप रे बाप कितना बोलती थी न तुम। इस बात पर ज्यादा ही बोलती थी की मुझे स्वाद की क़द्र नहीं। कई बार तो लगता है की कॉफी चाय से चिढ मुझे तुम्हारी ही वजह से हो गई है। नहीं नहीं इतना भी नहीं। पर जब तक तुम्हारी खिंचाई न कर लूँ मेरा भी खाना कहाँ हजम होता था।

तुम कई बार जयपुर से अपने घर आई पर हम अच्छे से नहीं मिल पाये। जनता हूँ तुम इसके लिए दोष मुझे ही देती होगी पर कैसे कहूँ कि न तो सिनेमा न ही कॉफी शॉप में बल्कि मैं तुमसे ऐसी जगह नहीं मिलना चाहता था जहाँ लोग हो। तब शायद हिम्मत कर रहा था कि तुमसे दिल की बात कह दूँ। पर मौका नहीं मिला। या ये कहें मौका निकालने की कोशिश नहीं की।

माँ अक्सर कहती हैं की रिश्तों में अगर शिकायतें ख़त्म हो जाएं तो वो मर जाता है। तो क्या सच में हमारा रिश्ता मर रहा है। इसके लिए जिम्मेदार भी तो मैं ही हूँ। न कभी कोई त्यौहार न तुम्हारा जन्मदिन न ही वेलेंटाइन या फ्रेंडशिप डे, ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैंने तुम्हे फ़ोन किया हो, लेकिन तुम मेरा जन्मदिन कभी नहीं भूली। पहले तो तुम हर त्यौहार में फ़ोन किया करती थी। फिर सिलसिला कम होता गया। हाँ जन्मदिन तो तुम आज भी नहीं भूलती मेरा। जानता हूँ पहले साल जब तुम गई तो कितनी लंबी बात की थी। कितनी उदास थी तुम यहाँ न आ पाने पर। वो उदासी मैं तुम्हारी आवाज़ में मेहसूस कर सकता था। 5 साल में बहुत कुछ बदला। वो उदासी अब ही मेहसूस करता हूँ लेकिन उसमें अपनेपन की मिठास कम होती जा रही है।

इतनी देर में माँ आ गई। कॉफी लेकर। मेरी माँ भी कम नहीं। कॉफी लेकर भी आई तो ब्लैक। एक छिपी हुई सी मुस्कान के साथ बहुत कुछ कह गई। कॉफी का घूंट पीते ही मैंने फैसला किया कि अपने रिश्ते को मरने नहीं दूंगा। कॉफी ख़त्म करते करते मैंने फैसला कर लिया। तुम्हारे जन्मदिन पर मैं आ रहा हूँ। तुम्हारे पास तुमसे सबकुछ कहने। सब कुछ सुनने। मैं आ रहा हूँ। मिलोगी ना मुझसे।

(जारी है…)