Girl Walking Away
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एक कहानी, बस यूं ही (आखरी भाग)

(Continued from here)

स्थान- जयपुर, कॉफी शॉप, बैकग्राउंड में गीत

किस मोड़ पर जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते,कुछ तेज कदम राहें

सुस्ती कदमों की हो तो उन्हें तेज़ किया जा सकता है पर जब राहें गुम सी लगने लगे तो क्या किया जाए
तो उन राहों को गुलजार कर लिया जाए एक अच्छी कंपनी के साथ।

अरे तुम कब आए, सॉरी मैं भूल गई थी ये कॉफी शॉप तो तुम्हारी ही है तुम कभी भी आ सकते हो।
हां, जब तुम राहों में उलझीं थी तभी रास्ते में था मैं।

अच्छा जी,आप भी तुकबंदी सीख गए?

अरे,फनकार तो हम पुराने हैं बस नज़र-ए-इनायत कभी नहीं की हमारे हुनर पर आपने लड़की।
ये तुम मुझे लड़की लड़की क्यों बोलते हो।

क्यों तुम लड़की नहीं?

हां पर नाम भी है मेरा।

लेकिन वो तो तुमने मुझे कभी बताया नहीं।

क्या बात करते हो, इतने महीने बीत गए मैंने अपना नाम नहीं बताया, वैसे तुमने भी तो नहीं पूछा।

हां जरुरत नहीं लगी, लड़की नाम किसी का नहीं है यहां। हा हा हा।

वैरी फनी, तुम जानते ही कितना हो मेरे बारे में?

जानना चाहता भी नहीं,मेरे लिए इतना काफी है कि तुम्हें कॉफी पसंद है और मेरी कॉफी शॉप भी।

हां, ये तो है। अच्छा,मैं जरा वॉशरुम से आती हूं।

वो लड़की चली गई, इसी बीच उसके मोबाइल पर फोन आया,रिंग लगातार हो रही थी तो मैंने फोन उठा लिया।

हैलो, जी वो कहीं गईं हैं, आप कौन?

मैं, मैं… मैं तो ठीक है, आप कौन?

जी मैं उनका दोस्त हूं, अरे अचानक से फोन काट दिया, है कौन ये?

इतनी देर में वो लड़की आ गई।

क्या हुआ?

तुम्हारे मोबाइल पर किसी का कॉल आया, मैंने उठाया तो मेरे बारे में पूछकर काट दिया।

चैक कर लो, पता नहीं कौन था।

लड़की- कोई बात नहीं, मुझे देर हो रही है, मैं निकलती हूं, बाय बाय।

स्थान- उस लड़के का घर

कौन था वो, जिसने फोन उठाया, वो तो कभी अपना फोन किसी को उठाने नहीं देती?

फिर वो कौन था,क्या कोई करीबी दोस्त, क्या मुझसे भी करीबी कोई है उसकी जिंदगी में?

क्यों उसने इस बारे में मुझे कभी नहीं बताया। क्या सच में उसके लिए हमारा रिश्ता मायने नहीं रखता अब। क्या मैंने बहुत देर कर दी। अब अब उसे बिना बताए जयपुर जाऊंगा, क्या मेरे मन में कोई शक पैदा हो रहा है। नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। मैं आज ही जयपुर जाऊंगा। मेरा मन क्यों घबरा रहा है, नहीं नहीं ये घबराहट नहीं बल्कि मिलने की उत्सुकता है, है ना सही बोल रहा हूं ना मैं, सब अच्छा होगा, ऑल इज़ वैल।

स्थान- जयपुर, कॉफी शॉप

लड़की- सुनो आज मैं फिल्म देखने जा रही हूं।

अकेले? उस कॉफी शॉप वाले लड़के ने पूछा

लड़की- हां क्यों क्या हुआ, क्या वहां लिखा है कि अकेले आना मना है?

नहीं,मुझसे ही पूछ लेती?

लड़की- मुझे लगा, कॉफी शॉप के खुलने के दौरान तुम नहीं जा पाओगे इसलिए नहीं पूछा

हां, ये बात भी सही है।

इस्क्यूज़मी

हाय, कैसी हो तुम?

अरे तुम, अचानक जयपुर कैसे आना हुआ। मीट माय फ्रैंड।

मैंने बताया था ना तुम्हें मेरे बचपन के साथी के बारे में, यही है वो।

और बताओ कैसे हो, कैसे रास्ता भूल गए।

बड़ी अजीब लग रही हैं तुम्हारी बातें, इतने साल बाद मिले लेकिन ऐसा लग ही नहीं रहा कि तुम्हें कोई खुशी है।

अरे खुशी क्यों नहीं, खुशी नहीं होती तो रुकती यहां, मैंने तो फिल्म का प्लान बना रखा था।

लेकिन देखो नहीं गई। तुम्हारे साथ ही हूं।

लड़का- चलो इस कॉफी शॉप से बाहर चलते हैं, कहीं घूमते हैं, सुना है पिंक सिटी बहुत सुंदर है।

हां, हां चलो।

दोनों बाहर चले गए।

स्थान- जयपुर की एक सड़क

दोनों बात करते जा रहे थे, लड़की जहां बिते दिनों को याद नहीं करना चाह रही थी वहीं लड़का बीती बातें रह-रहकर याद कर रहा था, उसे लगता कि शायद पुरानी बातों से पुराने ऐहसास लौट आएं। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था। अचानक लड़के ने पूछा- वो कॉफी शॉप पर कौन था तुम्हारे साथ।

लड़की ने कहा- मेरा दोस्त है, कॉफी शॉप उसी की है।

लड़का- कैसा दोस्त?

लड़की- कैसे से मतलब? दोस्त।

लड़का- मैंने फोन किया था आने के पहले, उसी ने फोन उठाया था शायद।

लड़की- हां बताया था उसने।

लड़का- तुमने आपत्ति नहीं की, पहले तो तुम चिढ़ जाती थीं कोई तुम्हारा फोन उठा ले तो?

लड़की- अरे पहले और अब में बहुत कुछ बदल गया, वक्त बदल गया, मैं बदल गई, हालात बदल गए, अब इतना सोचती नहीं।

अच्छा ये बताओ तुम्हारा आना कैसे हुआ? कुछ काम था?

लड़का- हां जरुरी काम था, बहुत जरुरी, जिंदगी की एक बड़ी उलझन में फंसा हूं, उसी गांठ को सुलझाने आया हूं।

लड़की- अच्छा, तो कोई छोर मिला?

लड़का- तुमसे शब्दों में जीतना मेरे बस की बात नहीं इसलिए सीधे पूछ रहा हूं। क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?

लड़की हंसी, पहले हल्के से मुस्कुराई फिर जोर जोर से हंसी। ये देखकर लड़का परेशान हो गया।

उसे समझ नहीं आया कि कैसा महसूस करे, लड़की की हंसी उसके लिए बड़ा सवाल बन गई थी।

ये सवाल उन पांच सालों के सवालों में सबसे बड़ा लग रहा था जिनके जवाब वो कई बार खुद को दे चुका था।

लड़की का हंसना अब तक जारी था।

लड़का खींच गया- मैंने ऐसा तो कोई जोक नहीं सुनाया?

लड़की- अच्छा, तो तुम पूछने आए हो कि मैं तुमसे प्यार करती हूं या नहीं। ये बताने नहीं आए कि तुम मुझसे प्यार करते हो या नहीं। हैं ना?

लड़का- हां बात तो एक ही हुई ना?

लड़की- नहीं, एक कैसे हो गई। दोनों अलग-अलग हैं।

लड़का- प्लीज यार, मैं गंभीर हूं। इतने साल हो गए, मैं अब किसी नतीजे पर पहुंचना चाहता हूं।

वैसे कॉफी शॉ़प वाला लड़का सच में तुम्हारा दोस्त ही है या उससे कुछ ज्यादा?

लड़की- तो शक कर रहे हो तुम? कुछ जलने की बदबू भी आ रही है। अच्छे लग रहे हो जलते हुए।

क्या सच में मुझे तुम्हें बताना चाहिए कि वो लड़का मेरा दोस्त ही है या उससे कुछ ज्यादा?

मैंने तो कभी नहीं पूछा तुमसे इन पांच सालों में कि तुम्हारी कोई दोस्त बनी की नहीं फिर सवाल मुझसे क्यों?

लड़का- सवाल तुमसे इसलिए क्योंकि मैं आया हूं तुमसे पूछने, तुम नहीं आईं।

लड़की- मैं नहीं आई, कितनी बार आई पर तुम्हारे पास ही वक्त नहीं रहा। मत भूलो अगर तुमने इस रिश्ते में कई साल दिए तो मैंने भी अपनी जिंदगी का सुनहरा वक्त दिया है।

कई मिनटों तक दोनों और से शांति रही। कोई कुछ नहीं बोला।

फिर अचानक लड़की उठी और बोली- हां मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं, बहुत, इन पांच सालों में ऐसा एक पल भी नहीं जब तुम्हें याद न किया हो। पर ऐसा क्यों हो रहा है कि तुम्हें अचानक सामने देखकर मैं वो खुशी महसूस नहीं कर पा रही जो मुझे होनी चाहिए। क्या वक्त की धूल ने हमारे रिश्ते को धुंधला कर दिया है।

लड़का- उसी धूल को तो हटाने आया हूं मैं, जब हम दोनों एक-दूसरे को प्यार करते हैं तो फिर कमी कहां हैं।

लड़की- कमी, पता नहीं कैसी कमी, पर कुछ तो है जो समझ नहीं आ रहा। समझ नहीं आ रहा तुम्हारा अभिमान या मेरा स्वाभिमान?

समझ नहीं आ रहा तुम्हारा शक करके मुझसे सवाल करना या मेरा कभी तुमसे कोई सवाल नहीं करना।

समझ नहीं आ रहा कि तुम्हारे साथ स़ड़क के इस रास्ते पर बैठूं या सड़क पार कर अपना नया रास्ता चुन लूं, कुछ समझ नहीं आ रहा।

लड़का- तुम्हारी उलझन मेरी समझ के बाहर है, तुम मुझे चाहती हो और मैं तुम्हें, फिर उलझन कैसी?

लड़की- उलझन है, उलझन इस बात की कि तुम ५ साल पहले वाली मैं को पसंद करते हो, जो तुम्हारे प्यार में पागल थी लेकिन ५ साल बाद वाली मैं, अपने लिए जीना चाहती है। वो हर बार ये सोचती नहीं कि दुनिया क्या कहेगी, घरवाले क्या कहेंगे या तुम क्या सोचोगे, जो मन में आता है वो करती है। क्या इस लड़की से प्यार कर पाओगे तुम?

लड़का- हां क्यों नहीं, मैं हर कीमत पर तुम्हारे साथ हूं।

लड़की- तो ठीक है, कीमत है आजादी।

लड़का- मतलब?

लड़की- आजादी, हर उस सोच की, जिसे मैं जीना चाहती हूं,आजादी उन मंजिलों को जिसे मैं पाना चाहती हूं, आजादी हर उस लम्हे की जिसे मैं अपने लिए जीना चाहती हूं, अगर तुम्हें ये मंजूर है तो हम फिर मिलेंगे, शायद इसी तरह कहीं टकरा जाएं तब अगर तुमने कोई सवाल नहीं किए तो यकीन मानों मैं जिंदगी भर तुम्हारे साथ रहूंगी लेकिन उससे पहले मैं अपने साथ रहना चाहती हूं।

अपने सपनों के साथ अपनी मंजिल की ओर,अपनी आजादी की ओर, मेरे जन्मदिन पर ये तोहफा तो तुम दे ही सकते हो।

मुझे मुस्कुराहट भरी नज़रों से देखती वो चली गई, आज समझ आया कि वो औरों से इतनी अलग क्यों है? अपने रवैये अपने सवालों पर गुस्सा भी आया फिर एक यकीन भी जागा, कि इस बार जब मैं उससे मिलूंगा तो कई शक, शुबा या सवाल नहीं होंगे। हम यकीनन मिलेंगे, ये मेरा भरोसा है, जो उसे भी मैं दिला कर रहूंगा।

स्वरा मैं तुम्हें अब पाना नहीं चाहता, तुम्हारे साथ कदम मिलाकर जीना चाहता हूं, ये वादा है अक्षय का।

समाप्त

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एक कहानी, बस यूं ही (भाग चार)

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स्थान – उस लड़के का घर

माँ की आवाज़ के साथ नींद खुली। आवाज़ नहीं फटकार। फटकार कि मैं फिर रात भर म्यूजिक सिस्टम ऑन करके सो गया। माँ बुदबुदा रही थी। बिजली का बिल इतना इतना आता है नवाब को चिंता नहीं। 5 साल हो गए टोकते टोकते। पहले तो कुछ किया नहीं गया अब ग़ालिब बने फिरता है। समझ नहीं आया माँ ताना मार रही है या सहानुभूति जाता रही है।

खैर माँ की बात को अनसुना करते हुए मैंने चाय का प्याला उठाया। वो ठंडी हो चुकी थी। लेकिन माँ का चेहरा देखकर हिम्मत नहीं हुई कि कहूँ फिर से बना दो। मैं पी गया। माँ को न जाने क्या लगा अचानक ही बोली ब्लैक कॉफी पियोगे, क्योंकि दूध नहीं है जो फिर से चाय बना दूँ। मैंने सर हिला दिया। माँ की बात पर थोड़ा गुस्सा तो थोड़ा प्यार भी आया। अरे ब्लैक कॉफी ही नहीं ब्लैक चाय भी तो होती है। पर माँ शायद मुझे कुछ याद दिलाने की कोशिश कर रही थी।

ब्लैक कॉफी तुम्हें बहुत पसंद है न? कितनी बार तुमने मुझे कहा कि कॉफी पर मिलते हैं पर मुझे तुमसे कॉ़फी पर मिलना अच्छा नहीं लगता। सच कहूँ कॉफी का स्वाद, स्वाद होता है पर तुम जब उसके फ्लेवर के बारे में बात करती तो ऐसा लगता जैसी अमृत पी रही हो।

बाप रे बाप कितना बोलती थी न तुम। इस बात पर ज्यादा ही बोलती थी की मुझे स्वाद की क़द्र नहीं। कई बार तो लगता है की कॉफी चाय से चिढ मुझे तुम्हारी ही वजह से हो गई है। नहीं नहीं इतना भी नहीं। पर जब तक तुम्हारी खिंचाई न कर लूँ मेरा भी खाना कहाँ हजम होता था।

तुम कई बार जयपुर से अपने घर आई पर हम अच्छे से नहीं मिल पाये। जनता हूँ तुम इसके लिए दोष मुझे ही देती होगी पर कैसे कहूँ कि न तो सिनेमा न ही कॉफी शॉप में बल्कि मैं तुमसे ऐसी जगह नहीं मिलना चाहता था जहाँ लोग हो। तब शायद हिम्मत कर रहा था कि तुमसे दिल की बात कह दूँ। पर मौका नहीं मिला। या ये कहें मौका निकालने की कोशिश नहीं की।

माँ अक्सर कहती हैं की रिश्तों में अगर शिकायतें ख़त्म हो जाएं तो वो मर जाता है। तो क्या सच में हमारा रिश्ता मर रहा है। इसके लिए जिम्मेदार भी तो मैं ही हूँ। न कभी कोई त्यौहार न तुम्हारा जन्मदिन न ही वेलेंटाइन या फ्रेंडशिप डे, ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैंने तुम्हे फ़ोन किया हो, लेकिन तुम मेरा जन्मदिन कभी नहीं भूली। पहले तो तुम हर त्यौहार में फ़ोन किया करती थी। फिर सिलसिला कम होता गया। हाँ जन्मदिन तो तुम आज भी नहीं भूलती मेरा। जानता हूँ पहले साल जब तुम गई तो कितनी लंबी बात की थी। कितनी उदास थी तुम यहाँ न आ पाने पर। वो उदासी मैं तुम्हारी आवाज़ में मेहसूस कर सकता था। 5 साल में बहुत कुछ बदला। वो उदासी अब ही मेहसूस करता हूँ लेकिन उसमें अपनेपन की मिठास कम होती जा रही है।

इतनी देर में माँ आ गई। कॉफी लेकर। मेरी माँ भी कम नहीं। कॉफी लेकर भी आई तो ब्लैक। एक छिपी हुई सी मुस्कान के साथ बहुत कुछ कह गई। कॉफी का घूंट पीते ही मैंने फैसला किया कि अपने रिश्ते को मरने नहीं दूंगा। कॉफी ख़त्म करते करते मैंने फैसला कर लिया। तुम्हारे जन्मदिन पर मैं आ रहा हूँ। तुम्हारे पास तुमसे सबकुछ कहने। सब कुछ सुनने। मैं आ रहा हूँ। मिलोगी ना मुझसे।

(जारी है…)

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एक कहानी, बस यूं ही (भाग तीन)

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स्थान – जयपुर, उस लड़की का घर, रात का वक्त।

चियर्स चियर्स… मस्त पार्टी है यार। कब से इंतज़ार था इस पार्टी का। 5 साल हो गए यार तुझे इस शहर में आए, इस ऑफिस में काम करते। कंजूस कहीं की, अब दी है पार्टी, पता नहीं कहां खोई रहती है तू। पार्टी हमें दी है पर ऐसा लगता है कि तेरा मन किसी और का इंतज़ार कर रहा है, हर वक्त।

चल बहुत रात हो गई अब हम सब चलते हैं।

सब चले गए, उफ्फ् हिम्मत नहीं ये कचरा समेटने की। शरीर थक कर चूर हो चुका है। पता नहीं कब जिस्म खिंच कर बिस्तर पर चला गया। पर नींद क्यों नहीं आ रही। सुना है थकान, नींद की सबसे अच्छी दोस्त होती है। पर मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं हो रहा। क्या मेरी किस्मत में दोस्त नहीं या दोस्ती नहीं। अनमना मन फिर जा पहुंचा पुराने दिनों में।

फ्लेशबैक में जीवन को देखना कितना अच्छा लगता है न, किसी पुरानी फ़िल्म की तरह। सच ही तो कहता था वो कि मैं बहुत फ़िल्मी हूँ। अरे नहीं, फिर नहीं। न चाहते हुए भी क्यों, क्यों हर बार मेरी हर बात उस पर आकर टिक जाती है। 5 साल हो गए। हमें दूर हुए, या ये कहें, कि करीब आए।

कभी हम तो कभी हालात ऐसे बने कि मिलना हुआ ही नहीं। हालात को क्या दोष दें कहीं न कहीं हम ही कतराने लगे थे एक-दूसरे से मिलने में। मैं सोचती कि अब मिलूंगी भी तो क्या बात करुँगी, क्या कहूँगी तुमसे। क्या हमारे बीच ऐसा कोई मुद्दा है जिस पर हम बात कर सकते हैं, गप्पे मार सकते हैं।

कई बार सोचा कि तुम्हारे साथ फ़िल्म देखने चलूँ, शायद यही ऐसा शौक है जो हम दोनों में है। शायद नहीं पक्का। फिल्मी बोलकर बदनाम मुझे करते थे तुम, पर तुम भी कम फिल्मी नहीं रहे, ये जानती हूं मैं। फिर क्यों जब भी मैं तुम्हें फिल्म देखने चलने के लिए कहती तुम उसे फ्लॉप या खामियां निकालकर चलने से मना कर देते।

कॉफ़ी पर मिलते हैं, ये कहा था मैंने, पर तुम्हें कॉफ़ी पसंद नहीं। जब भी छुट्टियों में अपने शहर आती, सारा वक़्त या तो कश्मकश में बीत जाता या नाराज़गी में। फिर परिवार को वक़्त न दूँ तो ये भी तो ठीक नहीं।

खैर शायद ये बहाने हैं, कभी कभी नहीं लगता कि अगर दुनिया में बहाने नहीं होते तो हमारी लाइफ कितनी बोरिंग हो जाती। मन को भी कितना बहाना बनाकर संभाला है मैंने। कई बार, न जाने कितनी बार, बहाने कुछ भी बना लें लेकिन इतना तो हम दोनों एक-दूसरे को जानते हैं कि अगर हम चाहते तो मिलते ज़रूर। हैं ना?

रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं न। कभी इतना गुस्सा आता है कि लगता है तुमसे सबकुछ ख़त्म कर लूँ। कभी मन की हालत ऐसी होती है कि तुम्हारे बिना जीना मुश्किल लगता है। कभी मन करता है तुमसे खूब झगड़ा करूँ फिर लगता है जिस चीज़ पर जोर नहीं उसे छोड़ देना ही अच्छा है शायद। दिल और दिमाग के द्वंद को कब नींद ने शांत किया पता ही नहीं चला।

बालकनी से झांकती सूरज की किरणों ने जब गुड मॉर्निंग कहा तब आंख खुली। कल की पार्टी का हैंगओवर अब तक उतरा नहीं, क्यों न कॉफी पी जाए।

हुमममम… कॉफी का कोई जवाब नहीं, हर घूंट के साथ एक सुकून सा लगता है, खासकर अपने हाथ की, खुद की तारीफ करते करते मन में एक सवाल फिर उठा, क्या सच में कल जो दिलो-दिमाग की लड़ाई थी वो सही थी, क्या दिमाग कुछ कह रहा था या दिल कुछ ठान रहा था। क्या सच्चाई को स्वीकार कर चुकी थी मैं कि अब इस रिश्ते से कोई उम्मीद नहीं। क्या मैं किसी तरह के बंधन से आज़ादी महसूस कर रही थी, बंधन अपने मन का, अपने आप से। जो रह-रह कर मुझे कहीं खींच ले जा रहा था। लेकिन कल रात क बाद से क्यों एक हल्कापन महसूस हो रहा था। क्या सोच रहा था मेरा दिमाग, क्या महसूस कर रहा था मेरा मन, कुछ समझ नहीं आ रहा, पर जो भी हो, बड़े दिनों बाद एक अजीब सी शांति महसूस की है मैंने, तो क्यों ना इसे सेलिब्रेट किया जाए। फिर बारिश के मौसम में गरमागरम कॉफी से अच्छा क्या होगा, वो भी अपनी कंपनी के साथ। मैं और मेरी तन्हाईंया। हां, हां मुझे पता है मैं बहुत फिल्मी हूं।

मैं झटपट तैयार हुई और कॉफी शॉप पहुँच गई। ये शॉप मुझे इसलिए भी पसंद है क्योंकि मैं जब भी यहाँ आती हूँ। यहाँ गुलज़ार के गाने बैकग्राउंड में राहत की बूंदे बिखेरते हैं। एक ही बार तो पूछा था उस शख्स ने कि मुझे किस तरह के गाने पसंद हैं। उसके बाद से जब भी यहाँ आती हूँ। गुलज़ार के नगमें सारी कॉफी शॉप को महकाते रहते हैं। कौन है वो। क्या ये कॉफी शॉप उसकी है। पता नहीं। पर हाँ कॉफी बहुत अच्छी बनती है यहाँ, बिल्कुल मेरे टाइप की।

(जारी है…)

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एक कहानी, बस यूं ही (भाग दो)

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गुलज़ार के गाने आज भी जब भी सुनता हूँ। तुम्हारा साथ याद आ जाता है। तुम्हारा गुनगुनाता चेहरा। गुनगुनाते लब, चित्रा सिंह की आवाज़ से आवाज़ मिलाती तुम्हारी आवाज़। कभी कहा नहीं पर, तुम अच्छा गाती हो। बहुत अच्छा। उस पर गाने के किसी शब्द या लाइन में मैं गलत बोल गुनगुना दूं, गलत बोल दूँ तो तुम कितना नाराज़ हो जाती थीं। अक्सर कहती पानी को गीला गुलज़ार ही कह सकते हैं। कई बार तो तुम जलने लगती गुलज़ार से। इतना अच्छा कैसे सोच लेते हैं गुलजार साहब।

तब मुझे तुम बहुत अज़ीब लगती। समझ ही नहीं आता कि कौन सी शख्सियत सही है तुम्हारी। किसी का इस हद तक प्रशंसक होना कि जलने लगो या वो लड़की जो किसी से किसी बात पर भी न जले। तब भी नहीं जब कोई लड़की तुम्हारे सामने कहे ,क्या मैं तुम्हारे दोस्त को अपने साथ ले जाऊं। तुम बड़े आराम से कह देती कि मेरी प्रॉपर्टी नहीं है, ले जाओ शौक से। तुम्हारा ये अंदाज़ जहाँ तुम्हें अलग रंग देता, वहीं कहीं दिल के किसी कोने में मुझे चुभ भी जाता। क्या सच में तुम्हे इस बात पर कभी जलन नहीं हुई कि मैं कहीं दूर चला गया तो।

हमारा रिश्ता गुलज़ार के गाने के साथ एक बस से शुरू हुआ। हमें सफ़र पसंद था मंज़िल नहीं। तुम कहती थी न क़ि सफ़र तुम्हें इसलिए पसंद है क्योंकि वो अनजना होता जबकि मंज़िल जानी पहचानी। तो क्या तुम्हें अनजनापन ही पसंद है। क्या यही वजह है कि हमने कभी अपने रिश्ते को नाम नहीं दिया। पहले तो नहीं लेकिन कई बार बातों बातों में मैं तुम्हारा वो कहना मेहसूस करता था, जो मैं शब्दों में सुनना या कहना चाहता था पर कभी कह नहीं पाया। मन हर बार उलझ जाता। कहीं तुम ये न कह दो कि हम दोनों एक दूसरे की प्रॉपर्टी नहीं। तुम्हारी आखों में जब जब देखता खुद के लिए प्यार दिखता। फिर तुम उन आखों को ऐसे चुरा लेती मानो अपने दिल के दरवाज़े बंद कर रही हो। कई बार सोचा हलकी सी दस्तक दूँ क्या, पर सवालों में ही उलझा रहता।

जब तुम्हें नए शहर में नई नौकरी मिली तब माँ ने पूछा था तुमसे कि अब मिलना होगा या नहीं। तुमने कह दिया अपने बेटे से पूछो। मेरी माँ जानती थी मेरे मन का हाल, वो ये भी जानती थी कि मैं कितना उलझन में हूँ, वो ये भी जानती थी कि मैं कितना प्यार करता हूँ तुमसे। तभी तो उसने पूछा था। तुमने फिर बात मुझ पर डाल दी। मैं क्या कहता। जब भी कुछ कहने की हिम्मत करता, मन घबरा जाता।

हम जब हंसते थे दोस्तों पर कि वो कितनी शिद्दत से हमारे रिश्ते को नाम देना चाहते थे, उस वक़्त मैं भी हँसता था पर यार वक़्त बदलता है न। धीरे धीरे हो गया तुझसे प्यार। क्या करुं, कंट्रोल थोड़े ही है, काश उस वक़्त उसी मजाक को रोक कर तुझे बोल देता की अब ये मज़ाक नहीं पर क्या उस वक़्त कोई अभिमान हो गया था मुझे। अभिमान, कि तुम तो मेरे साथ हो ही,कहाँ जाओगी।

पर ये अभिमान ज्यादा दिन नहीं रहा। तुम चली गईं। तब भी कुछ हिम्मत करता तो तुम कह गईं कि मन करे तभी कॉल करना वरना नहीं। उस वक़्त मुझे बहुत गुस्सा आया। क्या मतलब है एक बात का। क्या तुम समझती हो कि मैं नहीं रह सकता तुम्हारे बिना। नहीं करना तुमसे बात।

हर रोज़ यही कहता खुद से। फिर कॉल लगा लेता। कैसे बताऊँ कि तुम्हें भूलने की कोशिश में कितना ज्यादा याद करता हूँ।

बहुत वक़्त हो गया तुमसे बात किए। हर वक़्त डर लगा रहता है कि तुम क्या सोचोगी। फिर सोचता हूँ कि कसम तो तुमने भी नहीं खाई थी। फिर तुम फोन क्यों नहीं करती। पागल हो जाता हूँ इंतज़ार करके। क्या कभी तुम फोन नहीं करोगी। आज रात फिर मोबाइल और लैंडलाइन के सामने पता नहीं कितना वक़्त बीतेगा, तुम्हारे फोन का इंतज़ार किए। कब ख़त्म होगी ये कश्मकश कि तुम फोन करोगी या मैं करूं। मन में गुस्सा तो ज्वारभाटे जैसा उठता है पर पता नहीं क्यों तुम्हारा ख्याल मन में आते ही बारिश की ठंडक छा जाती है, गहरी सांस के साथ फिर मन मुस्कान के घेरे में आ जाता है।

जब से तुम गई हो मेरे तीन ही तो सहारे हैं तुम्हारी यादें, गुलज़ार के नगमे और फोन। क्या मेरे अंदर कोई उम्मीद नहीं रही या इंतज़ार मेरा हमसफ़र बनता जा रहा है।

(सुनते रहिए…)

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एक कहानी, बस यूं ही

An isspecial cutting chai to mark 10 years of Cutting the Chai specially brewed by the Chaiwali, Varsha Choudhury. A not-so-long story, but in many parts. The beginning:

बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफाई…

बस में सफ़र के दौरान जब रेडियो पर ये गाना सुना तो होठों पर मुस्कान खिल गई। मन को टटोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। सीधे मन जा पहुँचा उस बस में जहाँ गुलज़ार के एक गीत पर हम दोनों के मुंह से निकल पड़ा था, भैया “थोड़ा आवाज़ बढ़ाना” हलकी सी मुस्कान के साथ सफ़र तो आगे बढ़ गया लेकिन कुछ रह सा गया शायद । क्या था वो। क्या केवल एक मुस्कान। आखों में एक शरारत या कुछ और।

वक़्त बितता गया, हमारी मुस्कान, रोज की पहचान में बदली, पहचान दोस्ती में और फिर जो हुआ उसे शायद प्यार कहते हैं पर ना कभी मैंने कुछ कहा न तुमने। हाँ कुछ दोस्तों ने ज़रूर रिश्ते को नाम दिया पर हमने नहीं। बहते पानी की तरह पता नहीं किस सुरुर में बहे जा रही थी तुम्हारे साथ, अकेले में हम इस बात का कितना मजाक उड़ाते थे न कि लोग क्या क्या कहते हैं। क्या ज़रूरी है कि रिश्ते का नाम हो। पर सच कहूँ कभी कभी उन बातों के बीच कई बार लगा की क्या तुम मुझसे कहोगे कि लोग गलत भी कहाँ कहते हैं। पर तुम्हारे मजाक के अंदाज़ के आगे में बोलने की हिम्मत ही नहीं कर पाई। शायद डर गई थी कहीं ये सुनहरा सपना टूट ना जाय, मानो एक नशा था, जिसे उतारना नहीं चाहती थी मैं।

वक़्त के कदम अपनी रफ़्तार पकडे हुए थे। जब वक्त तुम्हारे साथ बीतता, लगता वक्त तेज चल रहा है, जब दूर रहते लगता वक्त क्यों सुस्त बैठा है, बढ़ ही नहीं रहा। समय के साथ चलते-चलते न जाने मैंने अपने मन की डोर तुमसे बांध ली, मुझे एहसास था इस बात का कि मैं तुम्हें लेकर कमजोर पड़ रही हूं, पर तुम कहते थे हमारे रिश्ते की USP है क़ि हमारे रिश्ते में भविष्य को लेकर कोई ज़िम्मेदारी या बंधन नहीं। तब मैं भी हाँ में सर हिला देती। तब मन को पक्का करती कि ना जैसे तुम हो मैं भी वैसी रहूंगी। मन को मनाने लगी कि कोई उम्मीद नहीं रखनी है न तुमसे, न खुद से, न इस रिश्ते से। बस तुम्हारे साथ अच्छा लगता है, यही काफी है।

फिर एक दिन मुझे अच्छी जॉब मिली, लेकिन दूसरे शहर में। तुमने मुझे बहुत बधाई दी। हिम्मत बंधाई कि मुझे नये रास्ते तलाशने चाहिए। मैंने भी सोचा शायद सही वक्त है खुद को तुम्हारे जादू से कुछ वक्त के लिए निकालने का। याद है तब तुम्हारी माँ ने मुझसे कहा था, क्या अब मुझसे मुलाकात नहीं होगी कभी। मैं केवल मुस्कुरा कर रह गई। कैसे कहती ये सवाल आपने कभी क्या अपने बेटे से किया। फिर मन में न जाने क्या ख्याल आया। मैंने जाते जाते कहा। हमारे रिश्ते में जब आज तक बंधन नहीं तो आगे भी नहीं होना चाहिए। तुम्हें अगर मन न करे तो कॉल मत करना। मेरा मन ही जानता है कि ये कहने का असली मकसद क्या था। उसने कहा जनता हूँ। बस इतना कहा था ना तुमने, न कुछ कम, न कुछ ज्यादा।

खैर, पिटारे में ढेर सारी यादें, थोड़ा सुकून, थोड़ा डर लेकर मैं नए शहर आ गई। नया जॉब। नए लोग। सबकुछ नया। पहले तुम्हारे  फ़ोन आए फिर सिलसिला कम हो गया, कम से बहुत कम। सच कहूँ तो कोई शिकायत भी नहीं रही तुमसे लेकिन कुछ तो था जो मन बैचेन कर रहा था। तभी ध्यान बस में बज रहे गाने की लाइनों पर गया – हम अपने पैरों में न जाने कितने भँवर लपेटे हुए खड़े हैं। बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफाई…

(सफ़र जारी है…)

Song: Hazar rahein mud ke dekhi
Film: Thodi Si Bewafai (1980)
Lyrics: Gulzar
Music: RD Burman
Singers: Kishore Kumar, Lata Mangeshkar

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10 years of Cutting the Chai
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10 years of Cutting the Chai: A decade of moulding the digital clay

2005 – it seems like so long a time ago (in fact, it is). Only birds tweeted back then and Facebook was ‘Thefacebook’ confined to a few elite US colleges. BlackBerry defined the smartphone. I was at my first job and one summer morning – on May 29, 2005 to be precise – signed up for my first blog and posted the first of many inconsequential posts.

It was like that first puff of a cigarette – the incertain beginning of a long addiction. Only that this was unlikely to kill me (I have meanwhile, quit smoking and also posted a post about that).

10 years of Cutting the Chai

Though the posts on the blog have become few and far between, I still post to scratch that itch. An itch I don’t want to go away.

Over the years many people have asked me, one question, “What’s your blog about?” And I always had this one-word reply, “Me!”

As someone who has been fascinated with the Internet ever since he typed in the magical characters “http://” on Internet Explorer 4’s address bar (only to be told that manual insertion of the http:// wasn’t really necessary), I see this website of mine as a virtual extension of the self. A variant of my self over which I have more control than the real me, one which I can mould it the way I want to. Cutting the Chai is digital clay.

This blog hasn’t been much about writing (primarily because I am not much of a writer) but more about sharing and experimenting (learnings from which I regularly apply to my day job as an Internet content and product person).

Cutting the Chai is, actually, cutting the chai (for the uninitiated, chai is tea). A verb, not a noun.

For me a glass of steaming-milky-syrupy tea is best served cut. One-by-two or two-by-three, it embodies the spirit of sharing and camaraderie (and more significantly a resource crunch).

Cutting the Chai is about sharing. I share my thoughts, ideas and whatever else interests me – from advertisements (vintage, sexy, random) to tech tips.

Tuffs shoes ad featuring Madhu Sapre and Milind Soman

The controversial Tuffs shoes ad from 1995 featuring Madhu Sapre and Milind Soman.

This isn’t a thematic blog, as the categories reveal (though the vintage ads get most noticed).

This blog began back in May 2005 as Mindless Musings of an Unmindful Mind on Google’s Blogger. A year later I had enough of the alliteration and changed the title to a more pretentious Cutting the Chai. In June 2010, had enough of Blogger and moved the blog to its own domain powered by the wonderful WordPress.

A peep into the archives tells me that this is the 1,016th post in 10 years. That’s an average of two posts a week. And averages can be deceiving. In the last three months, before this post, there has been only one post. In the early days of the blog, there were many months with more than a post a day.

Cutting the Chai has changed over the years and so have I. Switched jobs and moved to more demanding roles professionally and on the personal front became a husband and a father. The order of precedence has been altered.

Cutting the Chai has had its share of glory. Some of it before Facebook and Twitter rushed in to overpower our one-to-many communication systems. The blog was first noticed internationally because of that exhaustive post on Indian condoms that many websites in India and around the world linked to bringing huge traffic to the nascent website (pity the site didn’t carry any advertising then).

Condom bike

The World’s First Condom Bike built by K Sudhakar of Sudha Cars, Hyderabad. Pictured here sitting atop his condom bike (wonder if the material used is the same) on November 28, 2002.

Whether it was a rant against Apple’s attitude towards India or when Microsoft decided that Indians shouldn’t be searching for sex, the referral traffic continued to flow in.

Apple and India

Apple and India

Advertising is one of my many unrealised dreams. This let me to hunt for classic Indian advertisements on the World Wide Web, but in the mid 2000s, I found very little success in my online hunts. This gap in demand and supply led to the creation of the Vintage Indian Ads section and it has been the main ingredient in this brew of a blog. Today a small smile escapes my lips when I found many of the vintage ads that I laboriously scanned from old magazines collected from second-hand shops and collections from around the country, published without credit on many of today’s popular viral, buzzing and trending websites and social networks. This is the truth of the Web. No one cares about who was first, what matters is who brought it to you.

Zeenat Aman in a 1970 Air-India advertisement

Zeenat Aman as the classic Indian dark-haired beauty in 1970 Air India ad

The failed artist in me seeks succour in the Unofficial Google Doodles. The Google doodles are easily the most seen works of art in the world today but then there are many things that Google doesn’t and wouldn’t doodle about. This is another (imaginary) demand-supply gap that Cutting the Chai attempts to bridge.

Manmohan Singh’s 80th birthday unofficial Google doodle

Manmohan Singh’s 80th birthday unofficial Google doodle

So long, Hindustan Ambassador. An unofficial (and animated) Google doodle

So long, Hindustan Ambassador. An unofficial (and animated) Google doodle

Telangana statehood: Unofficial Google doodle

Telangana statehood: Unofficial Google doodle

India Public Domain Movie Project logoThis blog has also provided the base for many ambitious, albeit shelved, projects. The India Public Domain Movie Project was something I had long wanted to do, but YouTube’s flawed copyright policies set a rat amongst the celluloid. DOBMW.com was envisioned as the Directory of Official Bollywood Movie Websites, but with social networking spreading its net producers almost stopped making official movie websites. I had also set up a URL-shortening service cut.tc for Cutting the Chai, but the domain name registrar was charging a bomb when it came up for renewal. This along with other issues with the .tc TLD ensured that the URL shortener had a short life.

The filmi keeda in me also manages to crawl its way into the HTML. All this has resulted in what we call in Bangla joga khichuri. But I like the taste of it.

100 years of Indian cinema: The big Bollywood poster collage. To explore this collage of 782 Bollywood posters use the on-screen controls or drag and move or double click

One thing I loved the most about this decade-long blogging experience is the solitude. I made and managed most aspects – from tweaking the code or firing up the Photoshop to creating the content (obviously) – all alone. Just like the way I make my tea. No one else allowed in the kitchen while the tea pot is on the stove.

Anniversaries are often an excuse to do something out of the ordinary. And to celebrate Cutting the Chai’s 10th, I have also thought of some. It will (for a while) cease to be a solitary blogging experience. Other things will be served as and when I manage to cook them.

It is unlikely that you would come back here looking for fresh content, so I would like to take this opportunity to point you to the many ways in which you can remained tuned to what’s happening here at Cutting the Chai. You could Like the site on Facebook, or follow me on Twitter, subscribe to the RSS feed or sign up for email alerts. I promise an irregular dose of cutting chais.

The evolution of Cutting the Chai

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