Girl Walking Away
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एक कहानी, बस यूं ही (आखरी भाग)

(Continued from here)

स्थान- जयपुर, कॉफी शॉप, बैकग्राउंड में गीत

किस मोड़ पर जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते,कुछ तेज कदम राहें

सुस्ती कदमों की हो तो उन्हें तेज़ किया जा सकता है पर जब राहें गुम सी लगने लगे तो क्या किया जाए
तो उन राहों को गुलजार कर लिया जाए एक अच्छी कंपनी के साथ।

अरे तुम कब आए, सॉरी मैं भूल गई थी ये कॉफी शॉप तो तुम्हारी ही है तुम कभी भी आ सकते हो।
हां, जब तुम राहों में उलझीं थी तभी रास्ते में था मैं।

अच्छा जी,आप भी तुकबंदी सीख गए?

अरे,फनकार तो हम पुराने हैं बस नज़र-ए-इनायत कभी नहीं की हमारे हुनर पर आपने लड़की।
ये तुम मुझे लड़की लड़की क्यों बोलते हो।

क्यों तुम लड़की नहीं?

हां पर नाम भी है मेरा।

लेकिन वो तो तुमने मुझे कभी बताया नहीं।

क्या बात करते हो, इतने महीने बीत गए मैंने अपना नाम नहीं बताया, वैसे तुमने भी तो नहीं पूछा।

हां जरुरत नहीं लगी, लड़की नाम किसी का नहीं है यहां। हा हा हा।

वैरी फनी, तुम जानते ही कितना हो मेरे बारे में?

जानना चाहता भी नहीं,मेरे लिए इतना काफी है कि तुम्हें कॉफी पसंद है और मेरी कॉफी शॉप भी।

हां, ये तो है। अच्छा,मैं जरा वॉशरुम से आती हूं।

वो लड़की चली गई, इसी बीच उसके मोबाइल पर फोन आया,रिंग लगातार हो रही थी तो मैंने फोन उठा लिया।

हैलो, जी वो कहीं गईं हैं, आप कौन?

मैं, मैं… मैं तो ठीक है, आप कौन?

जी मैं उनका दोस्त हूं, अरे अचानक से फोन काट दिया, है कौन ये?

इतनी देर में वो लड़की आ गई।

क्या हुआ?

तुम्हारे मोबाइल पर किसी का कॉल आया, मैंने उठाया तो मेरे बारे में पूछकर काट दिया।

चैक कर लो, पता नहीं कौन था।

लड़की- कोई बात नहीं, मुझे देर हो रही है, मैं निकलती हूं, बाय बाय।

स्थान- उस लड़के का घर

कौन था वो, जिसने फोन उठाया, वो तो कभी अपना फोन किसी को उठाने नहीं देती?

फिर वो कौन था,क्या कोई करीबी दोस्त, क्या मुझसे भी करीबी कोई है उसकी जिंदगी में?

क्यों उसने इस बारे में मुझे कभी नहीं बताया। क्या सच में उसके लिए हमारा रिश्ता मायने नहीं रखता अब। क्या मैंने बहुत देर कर दी। अब अब उसे बिना बताए जयपुर जाऊंगा, क्या मेरे मन में कोई शक पैदा हो रहा है। नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। मैं आज ही जयपुर जाऊंगा। मेरा मन क्यों घबरा रहा है, नहीं नहीं ये घबराहट नहीं बल्कि मिलने की उत्सुकता है, है ना सही बोल रहा हूं ना मैं, सब अच्छा होगा, ऑल इज़ वैल।

स्थान- जयपुर, कॉफी शॉप

लड़की- सुनो आज मैं फिल्म देखने जा रही हूं।

अकेले? उस कॉफी शॉप वाले लड़के ने पूछा

लड़की- हां क्यों क्या हुआ, क्या वहां लिखा है कि अकेले आना मना है?

नहीं,मुझसे ही पूछ लेती?

लड़की- मुझे लगा, कॉफी शॉप के खुलने के दौरान तुम नहीं जा पाओगे इसलिए नहीं पूछा

हां, ये बात भी सही है।

इस्क्यूज़मी

हाय, कैसी हो तुम?

अरे तुम, अचानक जयपुर कैसे आना हुआ। मीट माय फ्रैंड।

मैंने बताया था ना तुम्हें मेरे बचपन के साथी के बारे में, यही है वो।

और बताओ कैसे हो, कैसे रास्ता भूल गए।

बड़ी अजीब लग रही हैं तुम्हारी बातें, इतने साल बाद मिले लेकिन ऐसा लग ही नहीं रहा कि तुम्हें कोई खुशी है।

अरे खुशी क्यों नहीं, खुशी नहीं होती तो रुकती यहां, मैंने तो फिल्म का प्लान बना रखा था।

लेकिन देखो नहीं गई। तुम्हारे साथ ही हूं।

लड़का- चलो इस कॉफी शॉप से बाहर चलते हैं, कहीं घूमते हैं, सुना है पिंक सिटी बहुत सुंदर है।

हां, हां चलो।

दोनों बाहर चले गए।

स्थान- जयपुर की एक सड़क

दोनों बात करते जा रहे थे, लड़की जहां बिते दिनों को याद नहीं करना चाह रही थी वहीं लड़का बीती बातें रह-रहकर याद कर रहा था, उसे लगता कि शायद पुरानी बातों से पुराने ऐहसास लौट आएं। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था। अचानक लड़के ने पूछा- वो कॉफी शॉप पर कौन था तुम्हारे साथ।

लड़की ने कहा- मेरा दोस्त है, कॉफी शॉप उसी की है।

लड़का- कैसा दोस्त?

लड़की- कैसे से मतलब? दोस्त।

लड़का- मैंने फोन किया था आने के पहले, उसी ने फोन उठाया था शायद।

लड़की- हां बताया था उसने।

लड़का- तुमने आपत्ति नहीं की, पहले तो तुम चिढ़ जाती थीं कोई तुम्हारा फोन उठा ले तो?

लड़की- अरे पहले और अब में बहुत कुछ बदल गया, वक्त बदल गया, मैं बदल गई, हालात बदल गए, अब इतना सोचती नहीं।

अच्छा ये बताओ तुम्हारा आना कैसे हुआ? कुछ काम था?

लड़का- हां जरुरी काम था, बहुत जरुरी, जिंदगी की एक बड़ी उलझन में फंसा हूं, उसी गांठ को सुलझाने आया हूं।

लड़की- अच्छा, तो कोई छोर मिला?

लड़का- तुमसे शब्दों में जीतना मेरे बस की बात नहीं इसलिए सीधे पूछ रहा हूं। क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?

लड़की हंसी, पहले हल्के से मुस्कुराई फिर जोर जोर से हंसी। ये देखकर लड़का परेशान हो गया।

उसे समझ नहीं आया कि कैसा महसूस करे, लड़की की हंसी उसके लिए बड़ा सवाल बन गई थी।

ये सवाल उन पांच सालों के सवालों में सबसे बड़ा लग रहा था जिनके जवाब वो कई बार खुद को दे चुका था।

लड़की का हंसना अब तक जारी था।

लड़का खींच गया- मैंने ऐसा तो कोई जोक नहीं सुनाया?

लड़की- अच्छा, तो तुम पूछने आए हो कि मैं तुमसे प्यार करती हूं या नहीं। ये बताने नहीं आए कि तुम मुझसे प्यार करते हो या नहीं। हैं ना?

लड़का- हां बात तो एक ही हुई ना?

लड़की- नहीं, एक कैसे हो गई। दोनों अलग-अलग हैं।

लड़का- प्लीज यार, मैं गंभीर हूं। इतने साल हो गए, मैं अब किसी नतीजे पर पहुंचना चाहता हूं।

वैसे कॉफी शॉ़प वाला लड़का सच में तुम्हारा दोस्त ही है या उससे कुछ ज्यादा?

लड़की- तो शक कर रहे हो तुम? कुछ जलने की बदबू भी आ रही है। अच्छे लग रहे हो जलते हुए।

क्या सच में मुझे तुम्हें बताना चाहिए कि वो लड़का मेरा दोस्त ही है या उससे कुछ ज्यादा?

मैंने तो कभी नहीं पूछा तुमसे इन पांच सालों में कि तुम्हारी कोई दोस्त बनी की नहीं फिर सवाल मुझसे क्यों?

लड़का- सवाल तुमसे इसलिए क्योंकि मैं आया हूं तुमसे पूछने, तुम नहीं आईं।

लड़की- मैं नहीं आई, कितनी बार आई पर तुम्हारे पास ही वक्त नहीं रहा। मत भूलो अगर तुमने इस रिश्ते में कई साल दिए तो मैंने भी अपनी जिंदगी का सुनहरा वक्त दिया है।

कई मिनटों तक दोनों और से शांति रही। कोई कुछ नहीं बोला।

फिर अचानक लड़की उठी और बोली- हां मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं, बहुत, इन पांच सालों में ऐसा एक पल भी नहीं जब तुम्हें याद न किया हो। पर ऐसा क्यों हो रहा है कि तुम्हें अचानक सामने देखकर मैं वो खुशी महसूस नहीं कर पा रही जो मुझे होनी चाहिए। क्या वक्त की धूल ने हमारे रिश्ते को धुंधला कर दिया है।

लड़का- उसी धूल को तो हटाने आया हूं मैं, जब हम दोनों एक-दूसरे को प्यार करते हैं तो फिर कमी कहां हैं।

लड़की- कमी, पता नहीं कैसी कमी, पर कुछ तो है जो समझ नहीं आ रहा। समझ नहीं आ रहा तुम्हारा अभिमान या मेरा स्वाभिमान?

समझ नहीं आ रहा तुम्हारा शक करके मुझसे सवाल करना या मेरा कभी तुमसे कोई सवाल नहीं करना।

समझ नहीं आ रहा कि तुम्हारे साथ स़ड़क के इस रास्ते पर बैठूं या सड़क पार कर अपना नया रास्ता चुन लूं, कुछ समझ नहीं आ रहा।

लड़का- तुम्हारी उलझन मेरी समझ के बाहर है, तुम मुझे चाहती हो और मैं तुम्हें, फिर उलझन कैसी?

लड़की- उलझन है, उलझन इस बात की कि तुम ५ साल पहले वाली मैं को पसंद करते हो, जो तुम्हारे प्यार में पागल थी लेकिन ५ साल बाद वाली मैं, अपने लिए जीना चाहती है। वो हर बार ये सोचती नहीं कि दुनिया क्या कहेगी, घरवाले क्या कहेंगे या तुम क्या सोचोगे, जो मन में आता है वो करती है। क्या इस लड़की से प्यार कर पाओगे तुम?

लड़का- हां क्यों नहीं, मैं हर कीमत पर तुम्हारे साथ हूं।

लड़की- तो ठीक है, कीमत है आजादी।

लड़का- मतलब?

लड़की- आजादी, हर उस सोच की, जिसे मैं जीना चाहती हूं,आजादी उन मंजिलों को जिसे मैं पाना चाहती हूं, आजादी हर उस लम्हे की जिसे मैं अपने लिए जीना चाहती हूं, अगर तुम्हें ये मंजूर है तो हम फिर मिलेंगे, शायद इसी तरह कहीं टकरा जाएं तब अगर तुमने कोई सवाल नहीं किए तो यकीन मानों मैं जिंदगी भर तुम्हारे साथ रहूंगी लेकिन उससे पहले मैं अपने साथ रहना चाहती हूं।

अपने सपनों के साथ अपनी मंजिल की ओर,अपनी आजादी की ओर, मेरे जन्मदिन पर ये तोहफा तो तुम दे ही सकते हो।

मुझे मुस्कुराहट भरी नज़रों से देखती वो चली गई, आज समझ आया कि वो औरों से इतनी अलग क्यों है? अपने रवैये अपने सवालों पर गुस्सा भी आया फिर एक यकीन भी जागा, कि इस बार जब मैं उससे मिलूंगा तो कई शक, शुबा या सवाल नहीं होंगे। हम यकीनन मिलेंगे, ये मेरा भरोसा है, जो उसे भी मैं दिला कर रहूंगा।

स्वरा मैं तुम्हें अब पाना नहीं चाहता, तुम्हारे साथ कदम मिलाकर जीना चाहता हूं, ये वादा है अक्षय का।

समाप्त

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एक कहानी, बस यूं ही (भाग चार)

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स्थान – उस लड़के का घर

माँ की आवाज़ के साथ नींद खुली। आवाज़ नहीं फटकार। फटकार कि मैं फिर रात भर म्यूजिक सिस्टम ऑन करके सो गया। माँ बुदबुदा रही थी। बिजली का बिल इतना इतना आता है नवाब को चिंता नहीं। 5 साल हो गए टोकते टोकते। पहले तो कुछ किया नहीं गया अब ग़ालिब बने फिरता है। समझ नहीं आया माँ ताना मार रही है या सहानुभूति जाता रही है।

खैर माँ की बात को अनसुना करते हुए मैंने चाय का प्याला उठाया। वो ठंडी हो चुकी थी। लेकिन माँ का चेहरा देखकर हिम्मत नहीं हुई कि कहूँ फिर से बना दो। मैं पी गया। माँ को न जाने क्या लगा अचानक ही बोली ब्लैक कॉफी पियोगे, क्योंकि दूध नहीं है जो फिर से चाय बना दूँ। मैंने सर हिला दिया। माँ की बात पर थोड़ा गुस्सा तो थोड़ा प्यार भी आया। अरे ब्लैक कॉफी ही नहीं ब्लैक चाय भी तो होती है। पर माँ शायद मुझे कुछ याद दिलाने की कोशिश कर रही थी।

ब्लैक कॉफी तुम्हें बहुत पसंद है न? कितनी बार तुमने मुझे कहा कि कॉफी पर मिलते हैं पर मुझे तुमसे कॉ़फी पर मिलना अच्छा नहीं लगता। सच कहूँ कॉफी का स्वाद, स्वाद होता है पर तुम जब उसके फ्लेवर के बारे में बात करती तो ऐसा लगता जैसी अमृत पी रही हो।

बाप रे बाप कितना बोलती थी न तुम। इस बात पर ज्यादा ही बोलती थी की मुझे स्वाद की क़द्र नहीं। कई बार तो लगता है की कॉफी चाय से चिढ मुझे तुम्हारी ही वजह से हो गई है। नहीं नहीं इतना भी नहीं। पर जब तक तुम्हारी खिंचाई न कर लूँ मेरा भी खाना कहाँ हजम होता था।

तुम कई बार जयपुर से अपने घर आई पर हम अच्छे से नहीं मिल पाये। जनता हूँ तुम इसके लिए दोष मुझे ही देती होगी पर कैसे कहूँ कि न तो सिनेमा न ही कॉफी शॉप में बल्कि मैं तुमसे ऐसी जगह नहीं मिलना चाहता था जहाँ लोग हो। तब शायद हिम्मत कर रहा था कि तुमसे दिल की बात कह दूँ। पर मौका नहीं मिला। या ये कहें मौका निकालने की कोशिश नहीं की।

माँ अक्सर कहती हैं की रिश्तों में अगर शिकायतें ख़त्म हो जाएं तो वो मर जाता है। तो क्या सच में हमारा रिश्ता मर रहा है। इसके लिए जिम्मेदार भी तो मैं ही हूँ। न कभी कोई त्यौहार न तुम्हारा जन्मदिन न ही वेलेंटाइन या फ्रेंडशिप डे, ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैंने तुम्हे फ़ोन किया हो, लेकिन तुम मेरा जन्मदिन कभी नहीं भूली। पहले तो तुम हर त्यौहार में फ़ोन किया करती थी। फिर सिलसिला कम होता गया। हाँ जन्मदिन तो तुम आज भी नहीं भूलती मेरा। जानता हूँ पहले साल जब तुम गई तो कितनी लंबी बात की थी। कितनी उदास थी तुम यहाँ न आ पाने पर। वो उदासी मैं तुम्हारी आवाज़ में मेहसूस कर सकता था। 5 साल में बहुत कुछ बदला। वो उदासी अब ही मेहसूस करता हूँ लेकिन उसमें अपनेपन की मिठास कम होती जा रही है।

इतनी देर में माँ आ गई। कॉफी लेकर। मेरी माँ भी कम नहीं। कॉफी लेकर भी आई तो ब्लैक। एक छिपी हुई सी मुस्कान के साथ बहुत कुछ कह गई। कॉफी का घूंट पीते ही मैंने फैसला किया कि अपने रिश्ते को मरने नहीं दूंगा। कॉफी ख़त्म करते करते मैंने फैसला कर लिया। तुम्हारे जन्मदिन पर मैं आ रहा हूँ। तुम्हारे पास तुमसे सबकुछ कहने। सब कुछ सुनने। मैं आ रहा हूँ। मिलोगी ना मुझसे।

(जारी है…)

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एक कहानी, बस यूं ही (भाग तीन)

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स्थान – जयपुर, उस लड़की का घर, रात का वक्त।

चियर्स चियर्स… मस्त पार्टी है यार। कब से इंतज़ार था इस पार्टी का। 5 साल हो गए यार तुझे इस शहर में आए, इस ऑफिस में काम करते। कंजूस कहीं की, अब दी है पार्टी, पता नहीं कहां खोई रहती है तू। पार्टी हमें दी है पर ऐसा लगता है कि तेरा मन किसी और का इंतज़ार कर रहा है, हर वक्त।

चल बहुत रात हो गई अब हम सब चलते हैं।

सब चले गए, उफ्फ् हिम्मत नहीं ये कचरा समेटने की। शरीर थक कर चूर हो चुका है। पता नहीं कब जिस्म खिंच कर बिस्तर पर चला गया। पर नींद क्यों नहीं आ रही। सुना है थकान, नींद की सबसे अच्छी दोस्त होती है। पर मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं हो रहा। क्या मेरी किस्मत में दोस्त नहीं या दोस्ती नहीं। अनमना मन फिर जा पहुंचा पुराने दिनों में।

फ्लेशबैक में जीवन को देखना कितना अच्छा लगता है न, किसी पुरानी फ़िल्म की तरह। सच ही तो कहता था वो कि मैं बहुत फ़िल्मी हूँ। अरे नहीं, फिर नहीं। न चाहते हुए भी क्यों, क्यों हर बार मेरी हर बात उस पर आकर टिक जाती है। 5 साल हो गए। हमें दूर हुए, या ये कहें, कि करीब आए।

कभी हम तो कभी हालात ऐसे बने कि मिलना हुआ ही नहीं। हालात को क्या दोष दें कहीं न कहीं हम ही कतराने लगे थे एक-दूसरे से मिलने में। मैं सोचती कि अब मिलूंगी भी तो क्या बात करुँगी, क्या कहूँगी तुमसे। क्या हमारे बीच ऐसा कोई मुद्दा है जिस पर हम बात कर सकते हैं, गप्पे मार सकते हैं।

कई बार सोचा कि तुम्हारे साथ फ़िल्म देखने चलूँ, शायद यही ऐसा शौक है जो हम दोनों में है। शायद नहीं पक्का। फिल्मी बोलकर बदनाम मुझे करते थे तुम, पर तुम भी कम फिल्मी नहीं रहे, ये जानती हूं मैं। फिर क्यों जब भी मैं तुम्हें फिल्म देखने चलने के लिए कहती तुम उसे फ्लॉप या खामियां निकालकर चलने से मना कर देते।

कॉफ़ी पर मिलते हैं, ये कहा था मैंने, पर तुम्हें कॉफ़ी पसंद नहीं। जब भी छुट्टियों में अपने शहर आती, सारा वक़्त या तो कश्मकश में बीत जाता या नाराज़गी में। फिर परिवार को वक़्त न दूँ तो ये भी तो ठीक नहीं।

खैर शायद ये बहाने हैं, कभी कभी नहीं लगता कि अगर दुनिया में बहाने नहीं होते तो हमारी लाइफ कितनी बोरिंग हो जाती। मन को भी कितना बहाना बनाकर संभाला है मैंने। कई बार, न जाने कितनी बार, बहाने कुछ भी बना लें लेकिन इतना तो हम दोनों एक-दूसरे को जानते हैं कि अगर हम चाहते तो मिलते ज़रूर। हैं ना?

रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं न। कभी इतना गुस्सा आता है कि लगता है तुमसे सबकुछ ख़त्म कर लूँ। कभी मन की हालत ऐसी होती है कि तुम्हारे बिना जीना मुश्किल लगता है। कभी मन करता है तुमसे खूब झगड़ा करूँ फिर लगता है जिस चीज़ पर जोर नहीं उसे छोड़ देना ही अच्छा है शायद। दिल और दिमाग के द्वंद को कब नींद ने शांत किया पता ही नहीं चला।

बालकनी से झांकती सूरज की किरणों ने जब गुड मॉर्निंग कहा तब आंख खुली। कल की पार्टी का हैंगओवर अब तक उतरा नहीं, क्यों न कॉफी पी जाए।

हुमममम… कॉफी का कोई जवाब नहीं, हर घूंट के साथ एक सुकून सा लगता है, खासकर अपने हाथ की, खुद की तारीफ करते करते मन में एक सवाल फिर उठा, क्या सच में कल जो दिलो-दिमाग की लड़ाई थी वो सही थी, क्या दिमाग कुछ कह रहा था या दिल कुछ ठान रहा था। क्या सच्चाई को स्वीकार कर चुकी थी मैं कि अब इस रिश्ते से कोई उम्मीद नहीं। क्या मैं किसी तरह के बंधन से आज़ादी महसूस कर रही थी, बंधन अपने मन का, अपने आप से। जो रह-रह कर मुझे कहीं खींच ले जा रहा था। लेकिन कल रात क बाद से क्यों एक हल्कापन महसूस हो रहा था। क्या सोच रहा था मेरा दिमाग, क्या महसूस कर रहा था मेरा मन, कुछ समझ नहीं आ रहा, पर जो भी हो, बड़े दिनों बाद एक अजीब सी शांति महसूस की है मैंने, तो क्यों ना इसे सेलिब्रेट किया जाए। फिर बारिश के मौसम में गरमागरम कॉफी से अच्छा क्या होगा, वो भी अपनी कंपनी के साथ। मैं और मेरी तन्हाईंया। हां, हां मुझे पता है मैं बहुत फिल्मी हूं।

मैं झटपट तैयार हुई और कॉफी शॉप पहुँच गई। ये शॉप मुझे इसलिए भी पसंद है क्योंकि मैं जब भी यहाँ आती हूँ। यहाँ गुलज़ार के गाने बैकग्राउंड में राहत की बूंदे बिखेरते हैं। एक ही बार तो पूछा था उस शख्स ने कि मुझे किस तरह के गाने पसंद हैं। उसके बाद से जब भी यहाँ आती हूँ। गुलज़ार के नगमें सारी कॉफी शॉप को महकाते रहते हैं। कौन है वो। क्या ये कॉफी शॉप उसकी है। पता नहीं। पर हाँ कॉफी बहुत अच्छी बनती है यहाँ, बिल्कुल मेरे टाइप की।

(जारी है…)

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