एक कहानी, बस यूं ही (भाग दो)

(Continued from here)

गुलज़ार के गाने आज भी जब भी सुनता हूँ। तुम्हारा साथ याद आ जाता है। तुम्हारा गुनगुनाता चेहरा। गुनगुनाते लब, चित्रा सिंह की आवाज़ से आवाज़ मिलाती तुम्हारी आवाज़। कभी कहा नहीं पर, तुम अच्छा गाती हो। बहुत अच्छा। उस पर गाने के किसी शब्द या लाइन में मैं गलत बोल गुनगुना दूं, गलत बोल दूँ तो तुम कितना नाराज़ हो जाती थीं। अक्सर कहती पानी को गीला गुलज़ार ही कह सकते हैं। कई बार तो तुम जलने लगती गुलज़ार से। इतना अच्छा कैसे सोच लेते हैं गुलजार साहब।

तब मुझे तुम बहुत अज़ीब लगती। समझ ही नहीं आता कि कौन सी शख्सियत सही है तुम्हारी। किसी का इस हद तक प्रशंसक होना कि जलने लगो या वो लड़की जो किसी से किसी बात पर भी न जले। तब भी नहीं जब कोई लड़की तुम्हारे सामने कहे ,क्या मैं तुम्हारे दोस्त को अपने साथ ले जाऊं। तुम बड़े आराम से कह देती कि मेरी प्रॉपर्टी नहीं है, ले जाओ शौक से। तुम्हारा ये अंदाज़ जहाँ तुम्हें अलग रंग देता, वहीं कहीं दिल के किसी कोने में मुझे चुभ भी जाता। क्या सच में तुम्हे इस बात पर कभी जलन नहीं हुई कि मैं कहीं दूर चला गया तो।

हमारा रिश्ता गुलज़ार के गाने के साथ एक बस से शुरू हुआ। हमें सफ़र पसंद था मंज़िल नहीं। तुम कहती थी न क़ि सफ़र तुम्हें इसलिए पसंद है क्योंकि वो अनजना होता जबकि मंज़िल जानी पहचानी। तो क्या तुम्हें अनजनापन ही पसंद है। क्या यही वजह है कि हमने कभी अपने रिश्ते को नाम नहीं दिया। पहले तो नहीं लेकिन कई बार बातों बातों में मैं तुम्हारा वो कहना मेहसूस करता था, जो मैं शब्दों में सुनना या कहना चाहता था पर कभी कह नहीं पाया। मन हर बार उलझ जाता। कहीं तुम ये न कह दो कि हम दोनों एक दूसरे की प्रॉपर्टी नहीं। तुम्हारी आखों में जब जब देखता खुद के लिए प्यार दिखता। फिर तुम उन आखों को ऐसे चुरा लेती मानो अपने दिल के दरवाज़े बंद कर रही हो। कई बार सोचा हलकी सी दस्तक दूँ क्या, पर सवालों में ही उलझा रहता।

जब तुम्हें नए शहर में नई नौकरी मिली तब माँ ने पूछा था तुमसे कि अब मिलना होगा या नहीं। तुमने कह दिया अपने बेटे से पूछो। मेरी माँ जानती थी मेरे मन का हाल, वो ये भी जानती थी कि मैं कितना उलझन में हूँ, वो ये भी जानती थी कि मैं कितना प्यार करता हूँ तुमसे। तभी तो उसने पूछा था। तुमने फिर बात मुझ पर डाल दी। मैं क्या कहता। जब भी कुछ कहने की हिम्मत करता, मन घबरा जाता।

हम जब हंसते थे दोस्तों पर कि वो कितनी शिद्दत से हमारे रिश्ते को नाम देना चाहते थे, उस वक़्त मैं भी हँसता था पर यार वक़्त बदलता है न। धीरे धीरे हो गया तुझसे प्यार। क्या करुं, कंट्रोल थोड़े ही है, काश उस वक़्त उसी मजाक को रोक कर तुझे बोल देता की अब ये मज़ाक नहीं पर क्या उस वक़्त कोई अभिमान हो गया था मुझे। अभिमान, कि तुम तो मेरे साथ हो ही,कहाँ जाओगी।

पर ये अभिमान ज्यादा दिन नहीं रहा। तुम चली गईं। तब भी कुछ हिम्मत करता तो तुम कह गईं कि मन करे तभी कॉल करना वरना नहीं। उस वक़्त मुझे बहुत गुस्सा आया। क्या मतलब है एक बात का। क्या तुम समझती हो कि मैं नहीं रह सकता तुम्हारे बिना। नहीं करना तुमसे बात।

हर रोज़ यही कहता खुद से। फिर कॉल लगा लेता। कैसे बताऊँ कि तुम्हें भूलने की कोशिश में कितना ज्यादा याद करता हूँ।

बहुत वक़्त हो गया तुमसे बात किए। हर वक़्त डर लगा रहता है कि तुम क्या सोचोगी। फिर सोचता हूँ कि कसम तो तुमने भी नहीं खाई थी। फिर तुम फोन क्यों नहीं करती। पागल हो जाता हूँ इंतज़ार करके। क्या कभी तुम फोन नहीं करोगी। आज रात फिर मोबाइल और लैंडलाइन के सामने पता नहीं कितना वक़्त बीतेगा, तुम्हारे फोन का इंतज़ार किए। कब ख़त्म होगी ये कश्मकश कि तुम फोन करोगी या मैं करूं। मन में गुस्सा तो ज्वारभाटे जैसा उठता है पर पता नहीं क्यों तुम्हारा ख्याल मन में आते ही बारिश की ठंडक छा जाती है, गहरी सांस के साथ फिर मन मुस्कान के घेरे में आ जाता है।

जब से तुम गई हो मेरे तीन ही तो सहारे हैं तुम्हारी यादें, गुलज़ार के नगमे और फोन। क्या मेरे अंदर कोई उम्मीद नहीं रही या इंतज़ार मेरा हमसफ़र बनता जा रहा है।

(सुनते रहिए…)