एक कहानी, बस यूं ही

An isspecial cutting chai to mark 10 years of Cutting the Chai specially brewed by the Chaiwali, Varsha Choudhury. A not-so-long story, but in many parts. The beginning:

बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफाई…

बस में सफ़र के दौरान जब रेडियो पर ये गाना सुना तो होठों पर मुस्कान खिल गई। मन को टटोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। सीधे मन जा पहुँचा उस बस में जहाँ गुलज़ार के एक गीत पर हम दोनों के मुंह से निकल पड़ा था, भैया “थोड़ा आवाज़ बढ़ाना” हलकी सी मुस्कान के साथ सफ़र तो आगे बढ़ गया लेकिन कुछ रह सा गया शायद । क्या था वो। क्या केवल एक मुस्कान। आखों में एक शरारत या कुछ और।

वक़्त बितता गया, हमारी मुस्कान, रोज की पहचान में बदली, पहचान दोस्ती में और फिर जो हुआ उसे शायद प्यार कहते हैं पर ना कभी मैंने कुछ कहा न तुमने। हाँ कुछ दोस्तों ने ज़रूर रिश्ते को नाम दिया पर हमने नहीं। बहते पानी की तरह पता नहीं किस सुरुर में बहे जा रही थी तुम्हारे साथ, अकेले में हम इस बात का कितना मजाक उड़ाते थे न कि लोग क्या क्या कहते हैं। क्या ज़रूरी है कि रिश्ते का नाम हो। पर सच कहूँ कभी कभी उन बातों के बीच कई बार लगा की क्या तुम मुझसे कहोगे कि लोग गलत भी कहाँ कहते हैं। पर तुम्हारे मजाक के अंदाज़ के आगे में बोलने की हिम्मत ही नहीं कर पाई। शायद डर गई थी कहीं ये सुनहरा सपना टूट ना जाय, मानो एक नशा था, जिसे उतारना नहीं चाहती थी मैं।

वक़्त के कदम अपनी रफ़्तार पकडे हुए थे। जब वक्त तुम्हारे साथ बीतता, लगता वक्त तेज चल रहा है, जब दूर रहते लगता वक्त क्यों सुस्त बैठा है, बढ़ ही नहीं रहा। समय के साथ चलते-चलते न जाने मैंने अपने मन की डोर तुमसे बांध ली, मुझे एहसास था इस बात का कि मैं तुम्हें लेकर कमजोर पड़ रही हूं, पर तुम कहते थे हमारे रिश्ते की USP है क़ि हमारे रिश्ते में भविष्य को लेकर कोई ज़िम्मेदारी या बंधन नहीं। तब मैं भी हाँ में सर हिला देती। तब मन को पक्का करती कि ना जैसे तुम हो मैं भी वैसी रहूंगी। मन को मनाने लगी कि कोई उम्मीद नहीं रखनी है न तुमसे, न खुद से, न इस रिश्ते से। बस तुम्हारे साथ अच्छा लगता है, यही काफी है।

फिर एक दिन मुझे अच्छी जॉब मिली, लेकिन दूसरे शहर में। तुमने मुझे बहुत बधाई दी। हिम्मत बंधाई कि मुझे नये रास्ते तलाशने चाहिए। मैंने भी सोचा शायद सही वक्त है खुद को तुम्हारे जादू से कुछ वक्त के लिए निकालने का। याद है तब तुम्हारी माँ ने मुझसे कहा था, क्या अब मुझसे मुलाकात नहीं होगी कभी। मैं केवल मुस्कुरा कर रह गई। कैसे कहती ये सवाल आपने कभी क्या अपने बेटे से किया। फिर मन में न जाने क्या ख्याल आया। मैंने जाते जाते कहा। हमारे रिश्ते में जब आज तक बंधन नहीं तो आगे भी नहीं होना चाहिए। तुम्हें अगर मन न करे तो कॉल मत करना। मेरा मन ही जानता है कि ये कहने का असली मकसद क्या था। उसने कहा जनता हूँ। बस इतना कहा था ना तुमने, न कुछ कम, न कुछ ज्यादा।

खैर, पिटारे में ढेर सारी यादें, थोड़ा सुकून, थोड़ा डर लेकर मैं नए शहर आ गई। नया जॉब। नए लोग। सबकुछ नया। पहले तुम्हारे  फ़ोन आए फिर सिलसिला कम हो गया, कम से बहुत कम। सच कहूँ तो कोई शिकायत भी नहीं रही तुमसे लेकिन कुछ तो था जो मन बैचेन कर रहा था। तभी ध्यान बस में बज रहे गाने की लाइनों पर गया – हम अपने पैरों में न जाने कितने भँवर लपेटे हुए खड़े हैं। बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफाई…

(सफ़र जारी है…)

Song: Hazar rahein mud ke dekhi
Film: Thodi Si Bewafai (1980)
Lyrics: Gulzar
Music: RD Burman
Singers: Kishore Kumar, Lata Mangeshkar